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असहाय, मजबूर, दिव्यांग, और बेसहारा लोगो के लिए किसी देवदूत से कम नही है ये इंसान, 1 हजार से ज्यादा बिछुडों को मिलवा चुका है ,

यह अकेला व्यक्ति समाजसेवा में किसी बड़ी संस्था से कम नही है।

विशेष खबर

जोधपुर,
नर सेवा नारायण सेवा, सेवा की भावना के  मंत्र से देश मे बहुत से लोग, संस्थाएं, सेवा का काम तो कर रही है मगर एक इंसान ऐसा भी है जो निस्वार्थ भाव से लोगो की सेवा में जुटा है। चाहे बच्चे हो या युवा या फिर बुजुर्ग, हर किसी के लिए यह व्यक्ति दिन रात एक कार उनकी सेवा करता है। गरीब, असहाय, अशक्तों की सेवा करना उसका जुनून है।  नही यह व्यक्ति अब तक 1 हजार से ज्यादा ऐसे लोगो को उनके परिजनों से मिलवा चुका है जो घर छोड़कर, भटक कर या किसी अन्य वजह से अपने घर से और परिजनों से दूर चले जाते है। कुछ ऐसे लोग जो अपने माता पता को , बीमारों को विकलांगो को छोड़ कर चले जाते है। घर छोड़ने के बाद जिनका ना घर होता है ना ठिकाना, बस फुटपाथ ही उनका ठिकाना बन जाता है। जो काम बड़ी बड़ी संस्थाएं नही कर सकती उस काम को यह व्यक्ति अकेला अपने दम पर करता है। यह अकेला व्यक्ति ही एक पूरी संस्था है। धरती पर अगर किसी देवदूत को देखना है तो आइए राजस्थान के जोधपुर शहर में।

 जी हां यह देवदूत है जोधपुर राजस्थान के निवासी प्रदीप अग्रवाल। प्रदीप अग्रवाल पिछले 10 सालों से ज्यादा समय से गरीब, असहाय, भटके हुए लोगो और गलत हाथों में पड़े बच्चों और किशोरों को नई जिंदगी देने में जुटे हुए है। उंन्होने के बच्चों और किशोरों को नरक जैसी जिंदगी से बाहर लेकर उन्हें उनके या तो घर भिजवाया है या फिर उन्हें किशोर ग्रह में भेजा है।

प्रदीप अग्रवाल पेशे से प्रॉपर्टी का काम करते है मगर दिन के ज्यादातर घंटे उनके समाजसेवा में गुजरते है। प्रदीप सुबह 6 बजे घर से निकलते है। ऐसे ही एक दिन जब वह घर से निकले तो 12- 14 साल के फटे कुचैले कपड़े पहने एक बच्चे को देख जो भीख मांग रहा था। प्रदीप उस बच्चे को तीन चार तक देखते रहे, आखिरकार उंन्होने उस बच्चे से बात करने की कोशिश की। पहले तो बच्चा उनसे बात करने को तैयार नही था और वह डरा सहमा से लग रहा था। प्रदीप ने उस बच्चे को बहुत समझाया तो उसने अपनी पूरी कहानी बयान की। कृष्णा नाम के उस बच्चे ने प्रदीप को जो कुछ बताया वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। कृष्णा ने उन्हें बताया कि वह अपने घर से भाग कर आया तो करीब 60-65 साल के एक व्यक्ति के हाथों में पड़ गया। वह व्यक्ति भीख मांगने, जेब कटवाना, कचरा चुगवांने का गैंग चलाता है। उसने उससे भीख मंगवानी शुरू की और जेब काटने का काम भी सिखाया। उसके गैंग में कई बच्चे और व्यक्ति है। बच्चे ने उन्हें बताया कि जिस दिन कम भीख मिलती है या नही मिलती है तो वह व्यक्ति उनकी पिटाई करता था और हाथ तोड़ देता था। प्रदीप उसकी दास्तान सुनकर हैरान रह गए और उस बच्चे के साथ एक अन्य बच्चे को लेकर पुलिस के पास गए और वंहा लिखा पढ़ी के बाद उसे पोस्को स्कूल जयपुर में भर्ती करवाया। आज ये दोनों बच्चे वंहा लिख पढ़ कर अपना सुनहरा  भविष्य बना रहे है।
ईसी तरह एक पागल व्यक्ति स्टेशन के आसपास घूमते हुए प्रदीप अग्रवाल ने देखा। बाल बिखरे हुए, शरीर पर मैल जमा हुआ, मैले कुचैले कपड़े पहने देखा। उंन्होने उससे बात करने की कोशिश कि मगर वह नाम पता नही बता सका। प्रदीप ने उसके लिए नए कपड़े खरीदे और नहला कर उसे पहनाए। कपड़े पहनने के दौरान उसके हाथ पर उसका नाम और पता लिखा देखा। उंन्होने ओखला दिल्ली के उस पते पर एक लेटर लिखा। लैटर भेजने के 10 दिन बाद उनके पास एक फ़ोन आया। फोन विजय नाम के उस शक्श के परिजनों का था। उंन्होने बताया कि वह तो समझ चुके थे कि वह शायद अब इस दुनिया मे नही है। दरअसल विजय के परिजनों को पत्र का जवाब देने में 10 दिन इसलिए लग गए क्यों कि उनकी दुकान पर नौकर का नाम भी विजय ही था। जो घर गया हुआ था। उसके वापस आने के बाद ही उन्होंने वह पत्र खोलकर देखा तो उन्हें पता लगा कि उनका विजय जिंदा है। प्रदीप की वजह से विजय 6 साल बाद अपने परिजनों को मिल सका था। इसी तरह से दिल्ली का ही एक व्यक्ति अपनी पत्नी से झगड़े के बाद घर से भागकर जोधपुर आ गया और यंहा स्टेशन के आसपास भीख मांगने लगा। वह चुप ही रहता था जिससे लोग उसे गूंगा समझते थे। के दिन की कोशिश के बाद उसने प्रदीप से बात की। तब प्रदीप ने उसे वापस उसके घर भिजवाया।
प्रदीप बताते है कि एक ऐसा मामला उनके सामने आया था करीब 2 साल पहले जो मानवता और रिश्तों को तार तार कर देने वाला था। भरतपुर की करीब 12 साल की एक बच्ची जो अपने बाप द्वारा ही बलात्कार का शिकार थी। वह अपने बाप के जुल्मों से तंग आकर घर छोड़कर आ गयी थी। उसे पुलिस की मदद से उंन्होने भरतपुर के महिला आश्रय घर भिजवाया। मगर महिला आश्रय घर वालो ने उसे कुछ दिन बाद वापस उसके बाप के पास भेज दिया। घर पंहुचते ही उसके बाप ने उसे फिर से अपनी हवस का शिकार बनाना शुरू कर दिया तो 3 महीने बाद वह लड़की भागकर फिर से जोधपुर आ गयी। वंहा फिर प्रदीप अग्रवाल की नजर उस लड़की पर पड़ी तो उसे वंहा देखकर हैरान रह गए। लड़की ने उन्हें आपबीती बताई तो प्रदीप ने महिला आश्रय घर वालो को कानूनी करवाई की चेतावनी दी। उसके बाद लड़की को वापस वंहा भेजा। अब करीब डेढ़ साल से लड़की वंही रह रही है। यह लड़की 3 बहने थी। मा थी नही। बड़ी लड़की को भी बाप ने अपनी हवस का शिकार बनाया तो वह भी घर से कंही भाग गई। बीच वाली को किसी को 50 हजार में बेच दिया था। सबसे छोटी इस लड़की को भी कलयुगी बाप ने नही छोड़ा था।
4 साल पहले एक महिला ट्रैन में भटक कर जोधपुर स्टेशन पर आ गयी। प्रदीप ने देखा कि टेक्सी वाले उसे परेशान कर रहे है। प्रदीप ने पुलिस की मदद लेकर उस महिला को उनके चंगुल से निकलवाया और एक महिला आश्रम में भिजवाया। इसी तरह से प्रदीप करीब 1 हजार से ज्यादा बच्चों, किशोरों, महिलाओं और व्यक्तियों को या तो उनके परिजनों से मिलवा चुके है या फिर, बाल, किशोर ग्रह, आश्रम, वृद्ध आश्रम भिजवा चुके है।
प्रदीप करीब 10 साल से अकेले ही इस काम मे जूट हुए है। उनका कहना है कि वह लोगो को भूख से परेशान देखता था। देखता था कि लोग भूखों को खाना तो दे देते है मगर वह बेचारे उस खाने को ज्यादातर जमीन पर रखकर खाने को मजबूर होते थे। जिसमें मिट्टी कंकड़ आदि उनके खाने में चली जाती थी। उसे यह देखकर बाद दुःख होता था। प्रदीप के मन मे ऐसे लोगो की सेवा की भावना यंही से जाग्रत होती चली गयी। वह सुबह उठता और 6 बजे एक बड़े थर्मस से 20-30 कप चाय, लेकर निकलता और स्टेशन और उसके आसपास ऐसे जरूरतमंद लोगों को पिलवाते है। वह घर से निकलने से पहले इसी चाय में से एक कप चाय खुद पीकर निकलते है। रात को दूध की दही जमा कर सुबह उसकी छाछ बनाकर गर्मी के दिनों में छाछ पिलाते है। दिन में और रात को भूखों को खाना खिलाते है। खाना वह अपने घर से लाते थे । बाद में उंन्होने एक महिला को खाना बनाने के काम पर रख लिया जो खाने के पैकेट तैयार करती है। वह ऐसे लोगो को प्लेट कटोरी आदि भी देते है। वह जरूरतमंदों को कपड़े , चप्पल, कंबल दवाई आदि भी उपलब्ध करवाते है। प्रदीप रात को 2 से तीन घंटे स्टेशन के आसपास ही घूमकर ऐसे लोगो को वाच करते है और फिर जरूरतमंद की सेवा और उसे उचित स्थान पर भेजने का अपना अभियान शुरू करते है।
अभी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में जोधपुर के सांसद शंभु सिंह और जिला कलेक्टर ने उन्हें छोटे बच्चों के पुनर्वास में उल्लेखनीय कार्य करने पर पुरस्कृत भी किया है। प्रदीप अग्रवाल ने बताया कि पिछले 10 सालों में उंन्होने जो भी काम किया है वह अकेले ही किया है और जोधपुर जीआरपी उन्हें सीएलजी नियुक्त कर रखा है। वह चोरी आदि करने वालो को भी पकड़कर पुलिस को सौंपते है। उनका कहना है कि गूंगे बहरे लोगो के इशारों से ही वह उनकी बात समझ लेते है। उनकी माता जी बोल नही पाती थी। बचपन से ही वह माता जिनके साथ बातचीत में इशारो को समझने लगा था। उनका कहना है कि जब उन्होंने जरूरतमंदों की सेवा का अपना अभियान शुरू किया था तो शुरू में तो घर वाले बहुत परेशान रहते थे और कहते थे कि सुबह सुबह कंहा चल दिये। तो वह जवाब देते थे कि बाहर भी कुछ लोग है जो उनका इंतेजार कर रहे है। प्रदीप कहते है कि वह प्रोपर्टी का काम करते है। उससे वह जो भी कमाते है उसका एक हिस्सा अपने सेवा के इस काम पर खर्च करते है। वह सरकार से, प्रशासन से या किसी संस्था से एक रुपया भी नही लेते है। प्रदीप सेवा के इस अभियान को ऐसी तरह से जारी रखे हुए है। उंन्होने कभी भी सरकारी अनुदान के लिए न तो कभी कोशिश की है और न ही कभी इच्छा की। अपने संसाधनों से जितना ज्यादा से ज्यादा हो सकता है वह करते है और अब तो परिवार भी उनका इस काम मे साथ देता है। प्रदीप का कहना है कि उन्हें इस काम मे असीम संतुष्टि मिलती है।
प्रदीप अग्रवाल जिस तरह से निस्वार्थ भाव से अकेले ही बिछुडा को मिलाने, भटके हुए को सही रास्ता दिखाने और अशक्त, असहाय व जरूरतमंदों को मदद करने का अभियान चलाए हुए है उस तरह के उदाहरण बहुत कम मिलते है। प्रदीप अग्रवाल जिस तरह से और जो काम कर रहे है वह काम लाखों करोड़ों रुपये अनुदान लेने वाली संस्थाएं भी उस तरह से अंजाम नही दे पाती है जिस तरह से प्रदीप कर रहे है। प्रदीप धरती पर किसी देवदूत से कम नही है। सही मायने में समाजसेवा कर रहे प्रदीप अग्रवाल जैसे लोगो के काम की तारीफ होनी चाहिये। अपने संसाधनो से निस्वार्थ सेवा कर रहे लोगो की तरफ सरकारों को भी ध्यान देने की जरूरत है। हालांकि प्रदीप कहते है कि वह किसी पुरस्कार, अवार्ड के लिए यह सब नही करते है। फिर भी प्रदीप जैसे लोग समाज के लिए प्रेरणा है और ऐसे लोगो बढ़ावा देने के लिए प्रदीप जैसे लोगो को भी सम्मान से नवाजा जाना चाहिए। प्रदीप अग्रवाल जैसे लोग सही मायनों में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाने के योग्य है।।
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