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मौत से ठनने के बाद भी “काल के कपाल पर” लिखे को नही मिटा पाए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लौटकर आने का वादा कर अनंत में हो गए विलीन

हरिद्वार से वाजपेयी जी को था बेहद लगाव, कचौड़ी और चाट खाने अक्सर आ जाते थे हरिद्वार

हरिद्वार,
काल के कपाल पर पर लिखता हूं, मिटाता हूं,” मगर इस बार अटल जी चाह कर भी काल के कपाल पर लिखे को मिटा नही पाए। अपनी दूसरी कविता “ठन गई मौत से ठन गई, मैं जी भर जिया मैं मन से मरु, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ, अपनी इस कविता के एक एक शब्द के अनुरूप वाजपेयी देश भर के लोगो से लौटकर आने का वादा कर दुनिया से कूच कर गए। आज भारतीय राजनीति के अटल अध्याय का अन्त हो गया।
राजनीति के भीष्म पितामह,प्रखर राजनेता, ओजस्वी वक्ता, लोकप्रिय कवि, कलम के जादूगर पत्रकार, भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नही रहे। आज 16 अगस्त को शाम 5 बजकर 5 मिनट पर दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया। वाजपेयी लंबे अरसे से बीमार चल रहे थे।
सन 1990 में किडनी की बीमारी के इलाज के लिए जब वाजपेयी अमेरिका गए थे तो वंहा से उंन्होने साहित्यकार धर्मवीर भारती को एक पत्र लिखा था जिसमे उंन्होने मौत से ठन जाने को लेकर एम मार्मिक कविता लिखी थी।
” ठन गई मौत से ठन गई, जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर खड़ी हो गई, यो लगा जिंदगी से बड़ी हो गई, ,
मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नही,जिंदगी सिलसिला आज कल की नही,
मैं जी भर जिया, मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूँ,”
और सच मे मौत से बिना डरे अटल जी दुनिया से सबको रोता बिलखते छोड़ गये।
हरिद्वार से था अटल जी को  गहरा लगाव–
पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का हरिद्वार से गहरा लगाव रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के जीने का अंदाज बिल्कुल अलग ही रहा है। वे जब भी हरिद्वार आते थे तो गंगा के किनारे रामघाट पर जयपुरिया धर्मशाला उनका पसंदीदा ठिकाना थी। वहीं से अटल जी चुपचाप पैदल ही चाट खाने निकल जाया करते थे।
अटल जी से जुड़े इतने किस्से और कहानियां मशहूर हैं कि उन पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं। अटल जी को खाने पीने का क्या शौक था, वो कहां रहते थे, कहां जाते थे, किससे मिलते थे, इन बातों पर कई लेख और किताबें छप चुकी हैं। वाजपेयी जी के ऐसे ही कुछ अनूठे और रोचक किस्से धर्मनगरी हरिद्वार से भी जुड़े हैं। कहा जाता है कि पार्टी अध्यक्ष रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी जी बिना किसी को बताए साल में दो तीन बार हरिद्वार आते थे। अटल बिहारी के हरिद्वार में उस वक्त के खासमखास लोगों में से एक रहे  भाजपा के तत्कालीन जिला अध्यक्ष अशोक त्रिपाठी बताते हैं कि अध्यक्ष रहते हुए वह अक्सर यहां आते रहते थे। चूंकि पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते उनका एक प्रोटोकॉल होता था, लिहाजा वह किसी बड़े होटल में ना रुककर रामघाट स्थित छोटी सी धर्मशाला जैपुरिया में रहा करते थे। त्रिपाठी बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी को हरिद्वार गंगा मैय्या तो खींचकर लाती ही थी साथ ही उन्हें रामघाट पर ओम प्रकाश चाट वाले की टिक्की भी बेहद पसंद थी। उसका स्वाद लेने वो अक्सर हरिद्वार की गलियों में घूमते दिखाई देते थे। त्रिपाठी का कहना है कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह हरिद्वार आए हों और यहां की चाट ना खाकर गए हों।
कचौड़ी और चाट खाने के शौकीन थे वाजपेयी-
रामघाट के  चाट विक्रेता सुशील कुमार बताते है अटल जी टिक्की खाने के शौकीन थे। उन्हें हरिद्वार की कचौड़ी भी बहुत पसंद थी। अटल जी वंही उनकी  चाट की रेहड़ी पर आम आदमी की तरह बैठकर चाट खाया करते थे।
अशोक त्रिपाठी उस समय का एक किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, एक बार जब वह हरिद्वार आए तो शाम के लगभग 5 बजे होंगे। वो धर्मशाला के कमरे से निकलकर हर की पैड़ी की तरफ निकल गए। एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी अटल बिहारी वाजपेयी पैदल ही हरकी पैड़ी की तरफ चल दिए। जब लोगों को इस बात का पता लगा तो वहां हड़कंप मच गया। पार्टी के सभी नेता आनन-फानन में मौके पर पहुंच गए।
वहां से लौटते हुए भी अटल जी हरकी पैड़ी के पास से रिक्शा पकड़कर धर्मशाला की ओर जाने लगे तब अशोक त्रिपाठी ने उन्हें ऐसा करने से रोका और उनको रिक्शा से उतारकर गाड़ी में लेकर गए।
अपनी यादें ताजा करते हुए अशोक त्रिपाठी कहते हैं, उस वक्त अटल बिहारी इस बात के लिए राजी नहीं हो रहे थे कि वह गाड़ी में जाएं, लेकिन उन्हें यह कहकर गाड़ी में बैठाया गया कि विपक्षी दल और दूसरे लोग यह कहकर बीजेपी पर तंज कसेंगे कि हरिद्वार के नेता अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए एक गाड़ी भी मुहैया नहीं करा पाए तब कंही जाकर उन्हें एक कार्यकर्ता की गाड़ी में धर्मशाला भेजा।
हरिद्वार से अटल बिहारी वाजपेयी को इतना लगाव था कि वह प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कई बड़े मंचों पर हरिद्वार के गाजर के हलवे और टिक्की की तारीफ कर देते थे। हरिद्वार उनके घर की तरह था। जब भी उनका मन करता, वो हरिद्वार के रामघाट पर जैपुरिया धर्मशाला में आकर रुक जाते।
एक दूसरा किस्सा बताते हुए अशोक त्रिपाठी कहते हैं, जब वह हरकी पैड़ी पर एक आरती में शामिल होने के लिए आए, तब गंगा सभा में उनको विजिटर बुक में कुछ लिखने के लिए कहा। तब उनके पास जो नजर का चश्मा था वह गाड़ी में रह गया था। तभी वहां खड़े तत्कालीन विधायक राजकुमार शर्मा ने अपना चश्मा जैसे ही उन्हें दिया वैसे ही अटल बिहारी वाजपेयी ने यह कहकर चश्मा लेने से मना कर दिया कि वह दूसरों की आंखों से नहीं देखते अपनी आंखों से ही देखना पसंद करते हैं। इस बात पर गंगा सभा में मौजूद सभी लोग न केवल हंसने लगे बल्कि उनकी इस  बात को भी लोगों ने गंभीरता से लिया।
हरिद्वार में एक धर्मशाला में ही आकर रुकते थे अटल जी-
कनखल में रहने वाले भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेता रहे मोहनलाल प्रभाकर दिल्ली वाले भी वाजपेयी के काफी नजदीकियों में से एक रहे है। प्रभाकर जी के पुत्र अनिल गुप्ता भी संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी है। अनिल गुप्ता बताते हैं कि रामघाट पर लोग आज भी अटल बिहारी वाजपेयी के किस्से और कहानियां सुनाते हैं। वह कहते हैं कि अटल बिहारी जिस धर्मशाला में रुकते थे आज उसका स्वरूप भले ही बदल गया हो लेकिन यहां के लोग आज भी उन्हें बेहद प्यार करते हैं। बीजेपी हो या दूसरे दलों के नेता आज भी अटल बिहारी वाजपेयी को अपना आदर्श मानते हैं।
अनिल गुप्ता कहते हैं कि जैपुरिया धर्मशाला के जिस 24 नंबर कमरे में वो रुकते थे वो बेहद खास था। गंगा की तरफ उस कमरे का मुख था। हरिद्वार से अटल बिहारी जी के ऐसे ना जाने कितने किस्से जुड़े हैं। ऐसे न जाने कितने किस्से श्री वाजपेई के जुड़े हुए हैं। अटल जी ऐसी शख्सियत थे की उनके किस्से कितने भी सुनाओ खत्म नहीं होंगे। राजनीति का यह अजात शत्रु आज चिर निद्रा में भले ही लीन हो गया हो, किन्तु उनका व्यक्तित्व व कृतित्व सदां उनके चाहने वालों के दिलों में जीवित रहेगा।
 अटल जी सार्वजनिक जीवन मे ईमानदारी की भी बड़ी मिसाल रहे है। 1991 में हरिद्वार की जनसभा के बाद अटल जी को नजीबाबाद में चुनावी सभा मे जाना था।  तब वाजपेयी जी के साथ हरिद्वार से केवल भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रद्युम्न अग्रवाल महामंत्री अनिल गुप्ता और मैं संजय आर्य खुद नजीबाबाद गए थे। प्रदुमन अग्रवाल बताते है कि नजीबाबाद में दिन का भोजन एक बड़ी सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी के मालिक के घर पर था। भोजन के बाद उन्होंने अटल जी को पार्टी फंड के लिए तब एक लाख रुपये का चैक दिया तो साथ मे पार्टी के संगठन महामंत्री कमलेश कुमार जी ने उन्हें बताया कि ये तो आपके नाम का चेक है। तब उन्होंने अपने नाम से चैक लेने से मना कर पार्टी के नाम से चैक देने को कहा था। इस पर उन उद्योगपति ने उन्हें अलग से एक लाख का दूसरा चैक पार्टी के नाम से देने को कहा था तो अटल जी कहा कि कोई नही आप दोनों चैक पार्टी के नाम से ही दे दीजिए।
अटल जी की सादगी भी देखिए , जब नजीबाबाद जा रहे थे तो हमारी गाड़ी उनकी गाड़ी उनकी गाड़ी के ठीक पीछे थी। अटल जी ने अचानक ही रास्ते मे एक खेत के पास लघुशंका के लिए गाड़ी रुकवाई थी।तब उन्होंने रास्ते भर सड़को में गड्ढों पर व्यंग करते हुए कहा कि पता ही नही चल रहा है कि सड़क में गड्ढे है या गड्ढों में सड़क है।
अटल जी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि
नजीबाबाद में सभा स्थल पर पंहुचने तक जितना जबरदस्त और शानदार स्वागत अटल जी का हुआ, ऐसा देश मे शायद ही किसी नेता का हुआ हो। करीब 3 किलोमीटर से ज्यादा रास्ते पर हजारो लोग, सड़को के किनारे और छतों से अटल जी पर लगातार पुष्प वर्षा करते रहे थे।
अटल जी का जाना पूरे देश को स्तब्ध कर देने वाला है। उनके जैसा नेता देश मे दूसरा हो पाना बहुत मुश्किल है।अटल जी के जाने के साथ ही भारतीय राजनीति के स्वर्णिम युग का अंत हो गया।
फ्रंट पेज न्यूज़ श्रधेय अटल जी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
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