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यदि पाना चाहती है मनचाहा वर और अमर सुहाग, तो ऐसे रखें हरियाली तीज का व्रत, लाल या हरे वस्त्र पहन कर करे शिव और गौरी की पूजा

                   हरियाली तीज पर विशेष
स्वामी चक्रपाणि,

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज या हरियाली तीज के नाम से जाना जाता है। हरियाली तीन 13 अगस्त दिन सोमवार को मनाई जाएगी। यह त्यौहार व्रत के रूप में लगभग पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है जिसमें विवाहित महिलाएं भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करती हैं। इस व्रत को करवाचौथ के व्रत से भी ज्यादा कठिन माना जाता है क्योंकि इस व्रत को रखने वाली ज्यादातर महिलाएं पूरे दिन बिना पानी की एक बूंद पिए ही रहती हैं। माना जाता है कि इस व्रत को निर्जला ही रखते हैं इस दिन कुछ खाया पिया नहीं जाता।

हरियाली तीज व्रत का मुहूर्त-
हरियाली तीज तिथि आरंभ : 13 अगस्त 2018, सुबह 8:38 बजे से

हरियाली तीज को कजली तीज भी कहा जाता है। यह पर्व भारतीय समाज में प्रकृति के साथ पद संचलन करने और उसके सौंदर्य में सहभागी होने का महान पर्व है। मुख्यतः यह महिलाओं का पर्व है। प्रकृति के उन्मादित एवं उत्साहपूर्ण वातावरण को आत्मसात् कर जीवन को उमंगमय बनाने का संकल्प इस दिन लिया जाता है। कुमारी कन्यायें हो या विवाहिता वे पूर्ण श्रृंगार और नवीन वस्त्रों में इस पर्व को मनाती हैं। इस दिन आम या अशोक के वृक्ष पर झूला डालना शुभ माना जाता है।
पर्व-विधान:
सावन का महीना होता है जो अत्यंत उत्साहवर्द्धक है। इसे प्रकृति के वरदान के रूप में महिलायें गीत, संगीत और नृत्य के माध्यम से करती हैं। इसके अतिरिक्त यह आत्म शुद्धि और आत्म परिमार्जन का पर्व भी है। शास्त्रों के अनुसार हरियाली तीज के दिन विवाहिता स्त्री को त्रिदोष से मुक्ति का संकल्प लेना चाहिए। तीन दोषों को तजने के कारण भी इसे तीज कहा जाता है। तीन दोष हैं- पति या परिवार से छल-कपट, असत्य वाचन, दुव्र्यवहार और कटुता और परनिंदा। हरियाली तीज को इन दोषों से मुक्ति का संकल्प लिया जाता है। तीज से एक दिन पहले हाथों पर मेहंदी लगायी जाती है। सूर्योदय से पूर्व उठकर राधा-कृष्ण का विग्रह
स्थापित कर उनका पूजन किया जाता है। विवाहिता अपने सास-ससुर तथा पति के चरण स्पर्श कर आशीष ग्रहण करती हैं। पूजन आदि के पश्चात सास या जेठानी को वस्त्र, सुहाग चिन्ह तथा भोजन दिया जाता है। पिता पक्ष की ओर से अपनी विवाहिता पुत्री के लिये उपहार
स्वरूप वस्त्र, आभूषण, मिष्ठान आदि भेजे जाते हैं। उत्तर भारत में इसे सिंधारा कहा जाता है। यह सिंधारा हरियाली तीज से एक दिन पहले आ जाता है। विवाहिता सिंधारे में आये मिष्ठान का वितरण परिवारजनों में करती है। यदि विवाहिता अपने पिता के घर है तो पति पक्ष की ओर से सिंधारा भेजने की परम्परा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ वर्गों में हैं। राजस्थान में हरियाली तीज पर महिलायें भवानी-पार्वती का पूजन करती हैं। वे अपने पिता के घर आ जाती हैं। इसका एक सामाजिक महत्त्व भी है। इस दिन वे अपनी सभी सहेलियों से मिल लेती हैं और संबंधों में नवीनता आ जाती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में महिलायें पैरों में अलता भी लगाती हैं। अलता सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। पूर्वान्चल में हरियाली तीज पर कजली गीत गाये जाते हैं। इन गीतों में प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन होने के साथ-साथ पारिवारिक
जीवन में माधुर्य का सजीव चित्रण होता है। विवाहित महिलायें उपवास रखती हैं। वे केवल दिन में फलाहार लेती हैं और सायंकाल भोजन करती हैं। मध्य प्रदेश ओर बुंदेलखंड के कुछ क्षेत्रो में यह पर्व श्रीकृष्ण भगवान् को समर्पित होता है। राधा-कृष्ण से संबंधित लोकगीत गाये जाते हैं।
 पर्व कथा-
इस पर्व की कथा का संबंध श्रीकृष्ण भगवान से है। श्रीकृष्ण मथुरा चले जाते हैं। गोपियां बार-बार श्रीकृष्ण को संदेश भेजती हैं कि वे गोकुल आ जायें। लेकिन वे स्वयं नहीं आते। अपने मित्र उद्धव जी को भेजते हैं। उद्धव जी राधा और गोपियों को वैराग्य का उपदेश देते
हैं। राधा जी उद्धव जी की बात मानने से इंकार कर देती हैं। राधा जी यमुना तट के एक उपवन में जाकर श्रीकृष्ण का ध्यान करती हैं। श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं और वे राधा जी के साथ झूला झूलते हैं। जब राधा जी श्रीकृष्ण के प्रकट होने की बात अन्य गोपियों को बताती हैं तो वे भी श्रीकृष्ण का ध्यान करती हैं। उस समय तो लगता है कि वे उनके साथ हैं। जब उद्धव जी को यह पता चलता है कि श्रीकृष्ण गोकुल में गोपियों के साथ थे। वे सीधे श्रीकृष्ण जी के पास मथुरा पहुंचते हैं। पता चलता है कि वे तो मथुरा से गये ही नहीं। इस पर आश्चर्यचकित उद्धव को श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि जो भी पवित्र भाव से मेरा स्मरण करता है, मैं उसके पास पहुंच जाता हूं। जिस दिन श्रीकृष्ण प्रकट हुए उस दिन श्रावण शुक्ल तृतीया थी। अतः हरियाली तीज के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है।
पर्व-सुफल:
यह पर्व भारतीयों के प्रकृतिसापेक्ष व्यवहार का द्योतक है। साथ ही नारी जाति के सामाजिक एवं पारिवारिक महत्त्व को प्रतिपादित करता है। यह कृषि आधारित पर्व भी है। हरियाली तीज के पश्चात बाजरा, फली, मोठ आदि फसल की बुआई की जाती है। ऐसे में महिलायें अच्छी वर्षा की प्रार्थना भी लोकगीतों के माध्यम से करती हैं। निश्चित तौर पर हरियाली तीज
भारतीय समाज का एक महान सांस्कृतिक आयोजन है।
कैसे करे तीज का व्रत-
तीज के दिन उपवास रखे  सोलह श्रृंगार करे और हरी चूड़ियां पहने, मेहंदी लगाए।
हरे या लाल रंग के कपड़े पहने। काले अथवा सफेद वस्त्रों को आज के दिन बिल्कुल भी मत पहने।

सायंकाल शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की उपासना करनी चाहिए।

हरियाली तीज की पूजा सामग्री के रूप में गीली मिट्टी, पीले रंग का नया कपड़ा, बेल पत्र, कलावा, धूप-अगरबत्ती, कपूर, घी का दीपक, फूल-फल, नारियल और पंचामृत आदि  इस्तेमाल कर सकते हैं।

वहां पर घी का बड़ा दीपक जलाना चाहिए.

संभव हो तो मां पार्वती और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें.

पूजा समाप्ति के बाद किसी सौभाग्यवती स्त्री को सुहाग की वस्तुएं दान करनी चाहिए तथा उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।

पूजा के बाद व्रत खोले और व्रत खोलने से पहले भगवान को खीर पूरी या हलुआ और मालपुए से भोग लगाना चाहिए।

 

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