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हिस्ट्रीशीटर से महंत बने गोल्डन बाबा की कांवड़ यात्रा पर खर्चा डेढ़ करोड़, कंहा से आ रहा है इतना पैसा, क्या इसकी हो सकेगी जांच

हरिद्वार,
अपने शरीर पर हमेशा करीब 12 किलो सोना धारण करने वाले गोल्डन पुरी बाबा एक बार फिर से चर्चाओं में है। चर्चा में है कांवड़ यात्रा पर भारी भरकम डेढ़ करोड़ के खर्च को लेकर। कांवड़ लेने हरिद्वार पंहुचे गोल्डन बाबा ने इस बार अपने शरीर पर 4 किलो सोना और बढ़ा लिया है। गोल्डन बाबा अपने दर्जनों चेलों के साथ हरिद्वार से कांवड़ लेकर पैदल दिल्ली जायेंगे। अपने शिष्यों के साथ हरिद्वार पहुंचे गोल्डन बाबा की कांवड़ यात्रा की इस साल सिल्वर जुबली है। गोल्डन बाबा का दावा है कि इस बार कावड़ पर करीब सवा करोड़ रुपये का खर्चा आ रहा है और इसी तरह वे हर साल भोले बाबा की कृपा से कावड़ लेकर जाते हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि आखिर इस महंगाई के दौर में जबकि आम आदमी को दो वक्त की रोटी के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है, वही घर गृहस्थी छोड़ सन्यास की दीक्षा लेकर हिस्ट्रीशीटर से सन्यासी गोल्डन बाबा के पास केवल कांवड़ मेले पर खर्च करने के लिए करोड़ो रूपये कंहा से आ रहे है। 
सोने से ऊपर से नीचे तक लदे हुए गोल्डन बाबा जूना अखाड़े के श्री महंत है। एक वर्तमान में नाम है गोल्डन पुरी महाराज। सोना पहनना इनका पुराना शौक है। पहले जब सोना सस्ता था तब यह कम सोना पहनते थे। अब जबकि सोना महंगा है तो किलो के हिसाब से सोना पहनते है। गोल्डन बाबा सामान्यतः अपने शरीर पर 12 किलो सोना पहनते है। मगर अपनी कांवड़ यात्रा की सिल्वर जुबली के मौके पर गोल्डन पुरी ने अपने शरीर पर इस बार करीब सवा करोड़ रुपये से अधिक कीमत का 4 किलो सोना और अधिक पहन लिया है। यानी अब गोल्डन बाबा ने अपने शरीर पर धारण कर रखा है लगभग 5 करोड़ रुपये का सोना। बाबा के पास इस वक्त करीब 20 किलो सोना है। बाबा बड़े गर्व से बताते है कि वह 1972 से सोना पहन रहे है। जब सोने का भाव 260-270 रुपये तौला था। तब 3 से 4 तौला ही पहनता था आज किलो के हिसाब से पहनता हूँ।
इस बार आज गोल्डन बाबा अपनी 25 वीं कावड़ लेकर हरिद्वार से रवाना हुए हैं।  25 साल पहले जब गोल्डन बाबा पहली बार हरिद्वार से कांवड़ लेकर गए थे तब कांवड़ सहित यात्रा पर कुल 260 रुपये का खर्च आया था। मगर आज 25 साल बाद सवा करोड़ रुपये कांवड़ यात्रा पर खर्च कर रहे है। गोल्डन बाबा इसे भोले की कृपा बताते हैं। मगर सवाल उठ रहा है कि एक अपराधी से सन्यासी बने गोल्डन बाबा के पास इतना पैसा आखिर आ कंहा से रहा है।
 

कौन है गोल्डन बाबा- जानिए बाबा का आपराधिक इतिहास–

 
सुधीर कुमार कक्कड़ उर्फ बिट्टू भगत उर्फ बिट्टू लाइट वाला, उम्र करीब 56 साल
निवासी गांधीनगर, दिल्ली,
वर्तमान पहचान श्री महंत, जूना अखाड़ा,
पुलिस रिकॉर्ड में पहचान- हिस्ट्रीशीटर, 
जी हां यही है आज के गोल्डन पुरी महाराज उर्फ गोल्डन बाबा की प्रोफाइल। बाबा के अतीत पर नजर डालते है। आज के गोल्डन बाबा कल के अपराधी है। बाबा का अतीत गुनाहों से भरा पड़ा है। सुधीर कुमार कक्कड़ उर्फ बिट्टू भगत उर्फ बिट्टू लाइट वाला कभी दिल्ली के गांधीनगर में लोगो के कपड़े सिलने यानी दर्जी का काम करता था। दर्जी का काम करते करते बिट्टू ने जीन्स बनाने का कारोबार शुरू कर दिया। जब थोड़ा पैसा आया तो प्रॉपर्टी में भी हाथ आजमाने शुरू कर दिए। इसके अलावा शादी विवाह, जागरण, जन्मदिन आदि जैसे कार्यक्रमो में लाइटिंग का काम शुरू किया। ऐसी लाइटिंग के काम से उसका नाम सुधीर से बिट्टु लाइट वाला पड़ गया। बिट्टू लाइट वाला करोड़ो का सालाना कारोबारी बन गया। एक दर्जी से करोड़ो के धंधेबाज बिट्टू ने किन किन तरीको से बेशुमार दौलत इकट्ठा की इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाबा कारोबार की आड़ में क्या क्या धंधे करते थे। अपने इन्ही धंधों के दौरान बिट्टू लाइट वाले ने कई गुनाह भी किये। गुनाह भी छोटे मोटे नही बल्कि अपहरण, जबरन वसूली, फिरौती, मारपीट, जान से मारने की धमकी देने जैसे तमाम छोटे बड़े गुनाह उनके नाम पर है। इन सब आरोपो में गोल्डन बाबा पर करीब 34 मुकदमे दर्ज है। अपहरण के एक मामले में गोल्डन बाबा जमानत पर चल रहे बताए जा रहे है। 2016 सिंहस्थ कुंभ में आयकर विभाग के भी रडार पर थे बाबा। दिल्ली के गांधीनगर थाने में बाबा की बाकायदा हिस्ट्रीशीट खुली हुए है, यानी बाबा के एक एक गुनाह का हिसाब आज भी इस थाने के बहीखातो में दर्ज है। 
गांधीनगर के जिस बिट्टू लाइट वाले को पुलिस तलाश करती रहती थी वही बिट्टू लाइट वाला एक दिन अचानक ही भगवा चोला पहने एक संत के वेश में दुनिया के सामने आ गया। बिट्टू लाइट वाले ने जूना अखाड़े के महंत मछन्दरपुरी का चेला बन महंतायी की चादर ओढ़ ली और बन बैठा गोल्डन बाबा। अखाड़े  उसे नाम दिया गोल्डन पुरी। सोना पहनना बिट्टू का शुरू से शौक़ रहा है। महंत बनने के बाद सोना उन्हें और भी लुभाने लगा और उंन्होने सोना की चमक उन्हें हमेशा की लुभाती रही है। महंत बनने के बाद बाबा ने गांधीनगर में अपना एक आश्रम भी बना लिया और 4 साल पहले हरिद्वार में भी एक 2 करोड़ में कोठी खरीद ली थी। हाल ही में बाबा ने हरिद्वार की कोठी 3 करोड़ में बेच दी है। बाबा लोगो से दान में सोना ही लेते है।
बाबा के बारे में कहा जाता है कि अपने आपराधिक इतिहास से बचने के लिए ही वह सन्यासी बने है। बाबा के साथ करीब एक दर्जन बॉडी गॉर्ड उनकी सुरक्षा में तैनात रहते है जिन पर  बाबा लाखो रुपये खर्च करते है।
बाबा सोना पहनने के शौकीन तो है ही, वंही बाबा को किशोर अवस्था से ही एक शौक और रहा है चरस यानी सुल्फे के नशे का। बाबा पक्के चरसी भी है। बाबा 24 घंटे चरस की पिनक में रहते है। बताया जाता है कि बाबा और उनके चेलों का रोजाना का चरस का खर्चा ही हजारो में है। अब सवाल यह भी उठता है कि बाबा के पास आखिर इतनी बड़ी मात्रा में चरस आती कंहा से है। 
गोल्डन बाबा के अपराधी से भगवाधारी बनने के बारे में क्या कहते है अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष- 
 
साधु संत सन्यासी यानी मोह और माया से दूर, दुनिया को अधर्म से धर्म का रास्ता दिखाने वाला। विद्वान, मनीषी, धर्म संस्कृति के रक्षक होते है संत। मगर आज संत समाज मे भी गिरावट आने लगी और अब केवल पैसों के बदले किसी को भी संतई का चोला पहना दिया जाता है। अब दिल्ली के गांधीनगर थाने का 3 दर्जन गुनाहों का अपराधी हिस्ट्रीशीटर बिट्टू लाइट वाला एकाएक भगवा पहन बन बैठा धर्म का ठेकेदार। खुद गुनाहों के दलदल में गले तक डूबा हुआ बिट्टू बन बैठा धर्म संस्कृति का अलंबरदार। एक अपराधी से गोल्डन पुरी बने बाबा के बारे में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी कहते है कि जो संत महंत बन रहा है, सन्यास की दीक्षा ले रहा है, अखाड़ा उसका पुराना रिकार्ड नही देखता है। अगर महंत बनाने के बाद उन्होंने कोई कांड किया हो तो बात अलग है। अगर कोई अपराधी है और वह सुधरना चाहता है, तो उसे सुधारने का मौका दिया जाना चाहिए। उसने पहले जो गुनाह किये है उनकी सजा उसे कानून देगा या फिर भगवान।
अखाड़ा परिषद के प्रवक्ता रहे बाबा हठयोगी धर्म में आ रही गिरावट पर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे है। बाबा हठयोगी कहते है कि सन्यासी बनने के लिए भी नियम कायदे है मगर आज अखाड़े आश्रमो ने नियम कायदों को ताक पर रख दिया है। अब तो केवल पैसा दो और भगवा पहन धर्म की ठेकेदारी का लाइसेंस ले लो। उनका कहना है कि आज ज्यादातर संत महामंडलेश्वर पैसा देकर बनाये जाते है ना ही योग्यता के आधार पर। एक इतिहास भूगोल सब पता होने के बाद भी महामंडलेश्वर बना दिया जाता है। बाबा हठयोगी का कहना है कि पहले विरक्त वैराग्य होता था तब महात्मा बनते थे मगर आज आसक्ति होने पर महात्मा बन रहे है। उनका कहना है आजकल महात्मा बनने के लिए कोई नियम नही, जिसके पास पैसा है चाहे वह चोर उच्चका है वह महात्मा बन जाता है। 
 
 
 
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